… के तुम हो – एहमद फ़राज़

7 05 2007

અહેમદ ફરાઝ ની એક વધુ ગઝલ … one of my favourites….

जिस सिम्त भी देखुं नज़र आता है के तुम हो,
ऐ जान-ए-जहां ये कोई तुम सा है के तुम हो ?

ये ख्वाब है खुश्बु है के जौंका है के पल है,
ये धुंद है बादल है के साया है के तुम हो ?

ईस दीद की सआत में कंई रंग है लरज़ां…
मैं हुं के कोई और है दुनिया है के तुम हो ?

देखो ये किसि और की आंखें है के मेरी ?
देखुं ये किसि और का चेहेरा है के तुम हो ?

ये उम्र-ए-गुरेज़ां कहीं ठहरे तो ये जानुं,
हर सांस में मुजको ये लगता है के तुम हो…

हर बज़्म में मौजु़-ए-सुखन दिल ज़दगां का,
अब कौन है शींरीं है के लैला है के तुम हो ?

एक दर्द का फैला हुआ सहरा है के मैं हुं ?
एक मौज में आया हुआ दरिया है के तुम हो ?

वो वक़्त ना आये के दिल-ए-ज़ार भी सोचे,
ईस शहर में तन्हा कोई हम सा है के तुम हो ?

आबाद हम आशुफ्तासरों से नहीं मक़्तल,
ये रस्म अभी शहर में ज़िंदा है के तुम हो

ऐ जान-ए-’फराज़’ ईतनी भी तौफीक़ किसे थी ?
हम को ग़म-ए-हस्ती भी गंवारां है के तुम हो…

- अहेमद फराज़


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