हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये,
हुं अधम आधीन अशरण, अब शरणमें लिजीये…
खा रहा गोते हुं मैं भव-सिंधु के मझधारमें,
दुसरा है आसरा कोई ना ईस संसारमें,
हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये…
मुझमें नहि जप-तप व साधन, और नहि कुछ ग्यान है,
निर्लज्जता है एक बाकी, और बस अभिमान है,
हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये…
पाप बोझे से लदी, नैया भंवर में जा रही…
नाथ दोडो़ अब बचाओ, शीघ्र डूबी जा रही,
हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये…
आप भी यदि छोड़ देंगे, फीर कहां जाउंगा मैं ??
जन्म-दु:ख से नाव कैसे पार कर पाउंगा मैं ??
हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये…
सब जगह मंझील भटकली, करली शरण अब आपकी,
पार करना या न करना, दोनों मरज़ी आपकी…
हे मेरे गुरुदेव करुणा-सिंधु करुणा किजीये,
हुं अधम आधीन अशरण, अब शरणमें लिजीये…


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ગુરુપૂર્ણિમા વખતે મારા ગુરુને આ ભ્જન આપીશ. સુંદર છે.
सुना है अपने गाँव में, रहा न अब वह नीम
जिसके आगे माँद थे, सारे वैद-हक़ीम।
Sundar Bhajan !