तेरे चाराग़र न थे ऐसे – एहमद फराज़

14 06 2007

ફરીથી ફરાઝ સાહબની એક ગ઼જ઼લ આજે સર-એ-મેહેફીલ…





गयी रुतों में तो शाम-ओ-सहर न थे ऐसे,
के हम उदास बहोत थे मगर न थे ऐसे.

यहां भी फूल से चहेरे दिखायी देते है,
ये अब जो है, यही दिवार-ओ-दर न थे ऐसे.

मिले तो खे़र न मिलने पे रंजिशें कैसी ?
के उस से अपने मरा़सिम थे पर न थे ऐसे.

हमी थे जो तेरे आने तलक जले वरना,
सभी चराग़ सर-ए-राहगुज़र न थे ऐसे.

दिल-ए-तबाह तुज़े और क्या तसल्ली दें,
तेरे नसीब – तेरे चाराग़र न थे ऐसे.

‘फराज़’ खुश हो, के एहसान उस सितमग़र के
जो तुज पे है वो किसी और पर न थे ऐसे…

- एहमद फराज़

शाम-ओ-सहर = દિવસ-રાત
रंजिशें = દુ:ખ, શોક, વેર, રોષ
मरा़सिम = સંબંધ
सर-ए-राहगुज़र = રસ્તા પર ના
चाराग़र = દાક્તર


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4 responses

14 06 2007
પ્રતીક નાયક

Really very good, touched my heart.

14 06 2007
रवि

धन्यवाद, आपने इतनी सुंदर ग़ज़ल पढ़वाई.

16 06 2007
Ali

Good one…but had to read it thrice to understand it nicely…and it took me some mins. to read it word by word…hehe…but after understanding, it really feels touchy…great work!!!

28 06 2007
sagarika

mare charaghar, marasim jeva shabdo na matlab ketla divas thi janva hata j aaje khabar padi gai, good work.

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