ફરીથી ફરાઝ સાહબની એક ગ઼જ઼લ આજે સર-એ-મેહેફીલ…
गयी रुतों में तो शाम-ओ-सहर૧ न थे ऐसे,
के हम उदास बहोत थे मगर न थे ऐसे.
यहां भी फूल से चहेरे दिखायी देते है,
ये अब जो है, यही दिवार-ओ-दर न थे ऐसे.
मिले तो खे़र न मिलने पे रंजिशें૨ कैसी ?
के उस से अपने मरा़सिम૩ थे पर न थे ऐसे.
हमी थे जो तेरे आने तलक जले वरना,
सभी चराग़ सर-ए-राहगुज़र૪ न थे ऐसे.
दिल-ए-तबाह तुज़े और क्या तसल्ली दें,
तेरे नसीब – तेरे चाराग़र૫ न थे ऐसे.
‘फराज़’ खुश हो, के एहसान उस सितमग़र के
जो तुज पे है वो किसी और पर न थे ऐसे…
- एहमद फराज़
૧शाम-ओ-सहर = દિવસ-રાત
૨रंजिशें = દુ:ખ, શોક, વેર, રોષ
૩मरा़सिम = સંબંધ
૪सर-ए-राहगुज़र = રસ્તા પર ના
૫चाराग़र = દાક્તર
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Really very good, touched my heart.
धन्यवाद, आपने इतनी सुंदर ग़ज़ल पढ़वाई.
Good one…but had to read it thrice to understand it nicely…and it took me some mins. to read it word by word…hehe…but after understanding, it really feels touchy…great work!!!
mare charaghar, marasim jeva shabdo na matlab ketla divas thi janva hata j aaje khabar padi gai, good work.