मिटा न गया

28 06 2007

3-૪ વરસો પહેલાં લખેલી મારી એક રચના આજે હાથ લાગી … જે અહીં મૂકી રહ્યો છું…




झानों पे गिर के रोया न गया,
करना था जो, सो किया न गया

ख़लिश है बाक़ी दिल में यही के,
मिटना था जहां, मिटा न गया

वही था चाराग़र, का़तिल भी वही,
दवा तो दे दी पर जीया न गया

रुख़सती कर दी और पूछा भी नही,
क्यों मुज़से उस वक़्त बोला न गया

मजबुरी-ए-हालात भी कम न थीं,
के हमसे चिता पे सोया न गया

- કુણાલ



झानों = ઘુંટણ
ख़लिश होना = ખૂંચવું
चाराग़र = હકીમ, doctor
रुख़सती कर दी = જતા રહ્યાં


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4 responses

28 06 2007
raviratlami

बढ़िया ग़ज़ल है.

29 06 2007
naraj

exellent….bahut khub- likhate ho…..kunalbhai …..kya andaj hai…….ki hum baya ….na kar sake……..keep it up……

2 07 2007
સુરેશ જાની

બહુ સરસ ગઝલ ..

3 07 2007
Rucha Jani

Bahot Khub!!

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