ग़म से कहीं निजात मिले चैन पाएं हम,
दिल खुं में नहाए तो गंगा नहाएं हम
जन्नत में जाएं हम कि जहन्नम में जाएं हम,
मिल जाए तु कहीं न कहीं तुज़ को पाएं हम
मुमकिन है ये कि वादे पे अपने वो आ भी जाए,
मुश्किल ये है कि आप में उस वक्त़ आएं हम
नाराज़ हो खुदा तो करें बंदग़ी से खुश,
माशूक़ रुठ जाए तो क्यों कर मनाएं हम
सर दोस्तों के काटकर रख्खे है सामने,
गैरों से पूछते है क़सम किसकी खाएं हम ?
सौंपा तुम्हे खुदा को चले हम तो नामुराद,
कुछ पढ के बख्शना जो कभी याद आएं हम
ये जां तुम न लोगे अगर, आप आएगी,
इस बेवफा की खैर कहां तक मनाएं हम ?
हमसाये जागते रहे नालों से रातभर,
सोये हुए नसीब को क्योंकर जगाएं हम
तु भुलाने की चीज़ नही खुब याद रख,
ऐ “दाग़” किस तरह तुजे़ दिल से भुलाएं हम….
- “दाग़” देहलवी
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