
નિદા ફાઝ઼લી નું નામ ગઝલોના શોખીન દરેકે સાંભળ્યું જ હશે અને એમની રચનાઓ માણી અને વખાણી જ હશે…
ઉર્દુ સાહિત્ય-મુશાયરામાં એમનું એક આગવું સ્થાન છે અને ભારતનાં આગલી હરોળનાં કવિ-શાયર તરીકે વર્ષોથી જાણીતા એવા એઓ ખુબ જ સરળ અને interestring વ્યક્તિ છે..
જગજીત સિંઘ-ચિત્રા સિંઘ એ મળીને એમની ઘણી ગઝ઼લો-નઝ઼મો ને સ્વરબદ્ધ કરી છે…
આજે મને ગમતું આ ગીત-દોહા, જે જગજીત સિંઘ એ “Insight” નામના Album માં સ્વરબદ્ધ કરી છે…
मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तारछोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसारलेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँवसबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी कोयल गाये गीतपूजा घर में मूर्ती मीरा के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दामसातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीरअच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूपसपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहासचाहे गीता बाचिये या पढ़िये क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञानबच्चा बोला देख कर,मसजिद आलीशान
मेरे खुदा तुझ एक को, इतना बडा मकानमंदिर के अंदर चढे घी-पूरी-मिष्ठान
मंदिर के बाहर खडा ईश्वर माँगे दानमै था अपने खेत मे,तुझको भी था काम
तेरी मेरी भूल का, राजा पड गया नामजादू-टोना रोज का, बच्चो का व्यवहार
छोटी सी एक गेंद मे भर दे सब संसार“सा” से “नी” तक सात सुर, सात सुरों का राग
उतना ही संगीत तुझमे, जितनी तुझमें आगसीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान
इक ही थैले मे भरे, आँसू और मुस्कानजीवन के दिन-रैन का, कैसे लगे हीसाब,
दीमक के घर बैठकर, लेखक लिखे किताबमुझ जैसा इक आदमी मेरा ही हमनाम
उल्टा-सीधा वो चले, मुझे करे बदनामयुग-युग से हर बाग़ का, ये ही एक उसूल
जिसको हँसना आ गया वो ही मट्टी फूलसुना है अपने गाँव में, रहा न अब वह नीम
जिसके आगे माँद थे, सारे वैद-हक़ीम।
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