तुम न आये एक दिन का वादा कर दो दिन तलक़
हम बडे तड़पा किये दो दो पहर दो दिन तलक़
दर्द-ए-दिल अपना सुनाता हुं कभी जो एक दिन,
रहेता है उस नाज़नीं को दर्द-ए-सर दो दिन तलक़
देखते है ख्वा़ब में जिस किसु की चश्म-ए-मस्त
रहेते है हम दो जहां से बेखबर दो दिन तलक़
गर यकिं हो जाये हमें आयेगा तु दो दिन के बाद
तो जियें हम और ईस उम्मीद पर दो दिन तलक
क्या सबब क्या वास्ता क्या काम था बतलाईए
घर से जो निकले न अपने तुम “ज़फ़र” दो दिन तलक़
- बहादुर शाह ‘ज़फर’
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