ઉર્દુ સાહિત્ય-મુશાયરામાં એમનું એક આગવું સ્થાન છે અને ભારતનાં આગલી હરોળનાં કવિ-શાયર તરીકે વર્ષોથી જાણીતા એવા એઓ ખુબ જ સરળ અને interestring વ્યક્તિ છે..
આજે મને ગમતું આ ગીત-દોહા, જે જગજીત સિંઘ એ “Insight” નામના Album માં સ્વરબદ્ધ કરી છે…
मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार
लेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव
सबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी कोयल गाये गीत
पूजा घर में मूर्ती मीरा के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम
सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप
सपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास
चाहे गीता बाचिये या पढ़िये क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान
बच्चा बोला देख कर,मसजिद आलीशान
मेरे खुदा तुझ एक को, इतना बडा मकान
मंदिर के अंदर चढे घी-पूरी-मिष्ठान
मंदिर के बाहर खडा ईश्वर माँगे दान
मै था अपने खेत मे,तुझको भी था काम
तेरी मेरी भूल का, राजा पड गया नाम
जादू-टोना रोज का, बच्चो का व्यवहार
छोटी सी एक गेंद मे भर दे सब संसार
“सा” से “नी” तक सात सुर, सात सुरों का राग
उतना ही संगीत तुझमे, जितनी तुझमें आग
सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान
इक ही थैले मे भरे, आँसू और मुस्कान
जीवन के दिन-रैन का, कैसे लगे हीसाब,
दीमक के घर बैठकर, लेखक लिखे किताब
मुझ जैसा इक आदमी मेरा ही हमनाम
उल्टा-सीधा वो चले, मुझे करे बदनाम
युग-युग से हर बाग़ का, ये ही एक उसूल
जिसको हँसना आ गया वो ही मट्टी फूल
सुना है अपने गाँव में, रहा न अब वह नीम
जिसके आगे माँद थे, सारे वैद-हक़ीम।
પાંખડીઓ પરના ઝાકળબિંદુઓ…